भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 क्या हैं ? BNS Section 37 In Hindi

BNS Section 37 In Hindi हॅलो‌ ! इस पोस्ट में हम आपको भारतीय न्याय संहिता (Bhartiya Nyay Sanhita) की धारा 37 क्या हैं ( What is BNS Section 37 in Hindi) इसके बारे में जानकारी देने वाले हैं। पहले हमारे देश में भारतीय दंड संहिता यह कानून था। लेकिन अब इसकी जगह भारतीय न्याय संहिता ने ली हैं। अभी संसद द्वारा पारित तीन विधेयकों ने अब कानून का रूप लिया हैं। भारतीय दंड संहिता को अंग्रेजों ने लागू किया था। अंग्रेजों के समय से भारत में भारतीय दंड संहिता लागू थी।

 BNS Section 37 In Hindi

भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 क्या हैं ? BNS Section 37 In Hindi

अंग्रेजों के काल से जो आपराधिक कानून भारत में लागू थे उनकी जगह लेने वाले तीन संशोधन विधेयकों पर कुछ ही दिन पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दी। अब भारतीय दंड संहिता की जगह भारतीय न्याय संहिता ने ली हैं। भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 में ऐसे कार्यों के बारे में बताया हैं जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 क्या हैं इसके बारे में विस्तार में जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारी यह पोस्ट अंत तक जरुर पढ़िए।

भारतीय न्याय संहिता (Bhartiya Nyay Sanhita) की धारा 37 क्या हैं ( What is BNS Section 37 in Hindi) –

भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 में ऐसे कार्यों के बारे में बताया हैं जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 के अनुसार 1) उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है –

क) यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न किया जाता हैं तो चाहे वह कार्य विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो।

ख) यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक के निर्देश से किया जाता हैं, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं हैं, चाहें वह निर्देश विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो।

ग) उन दशाओं में, जिनमें संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय हैं, प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं हैं।

2) किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं हैं, जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक हैं।

स्पष्टीकरण 1 – कोई व्यक्ति किसी लोक सेवा द्वारा ऐसे लोक सेवक के नाते किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित, कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक की वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, की उस कार्य को करने वाला व्यक्ती ऐसा लोक सेवक हैं।

स्पष्टीकरण 2 – कोई व्यक्ति किसी लोकसेवा के द्वारा ऐसे लोकसेवक के नाते किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित, किसी कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक की वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ती ऐसे निर्देश से कार्य कर रहा हैं, या जब तक की वह व्यक्ति उस प्राधिकार का कथन न कर दे, जिसके अधीन वह कार्य कर रहा हैं, या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार हैं, जो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर पेश न कर दे।

FAQ

भारतीय न्याय संहिता में कितनी धारा हैं ?

भारतीय न्याय संहिता में 356 धारा हैं।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 में किस बारे में जानकारी दी गई है ?

भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 में ऐसे कार्यों के बारे में बताया हैं जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है।

इस पोस्ट में हमने आपको भारतीय न्याय संहिता की धारा 37 क्या हैं इसके बारे में जानकारी दी है। हमारी पोस्ट शेयर जरुर किजिए। धन्यवाद !

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